कविवर श्री गजेन्द्र सोलंकी, दिल्ली
Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
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कोटि नक्षत्र जैसे नित गगन में टिमटिमाते हैं हैं कितने लोग दुनियाँ में जो कि मन को लुभाते हैं मगर दिनकर है केवल एक नभ को जगमगाता है यूँ “चेतन” मित्र मेरे मन के आँगन मुस्कुराता है http://gajendersolanki.com |
