Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
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परिणय दिवस शुभ आपका, पावन परम पुनीत
अभिनन्दन में हम लिखें, मेहंदी वाले गीत
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नव ऊर्जा नव योजना, नव नूतन श्रृंगार
मंगलमय शुभकामना, कर लीजै स्वीकार
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हत्यारों की लाश को, ले जा अपने देश
पाक सैनिक यह सभी, आतंकी था देश
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मियां मुशरर्फ बजा रहे, विश्व शांति का ढोल
अडवानी ने खोल दी, उनकी सारी पोल
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गोंविद-गोंविद भज रहे, गोंविद है नाराज
झंडेवाला ने किया, उनको नजरअंदाज
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दस जनपथ से जब मिला, सासु जी का प्यार
दामाद तजकर आ गये, अपना ही परिवार
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भाषण में होशियार हैं, दिल में रखते खोट
आतंकी को पालते, करते क्यों नहीं चोट
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कूटनीति बस एक है, हत्यारों को कूट
धर्म जाति क्यों देखते, तुमको पूरी छूट
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Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
अंग्रेजी पतझड़ गया, हिन्दी सावन आज
अब तो अपने देश में, हो हिन्दी का राज
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सोने की चिड़िया रहा, अपना भारत देश
सोना दुश्मन ले गया, चिड़िया रह गयी शेष
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कर्म भाग्य दोनों बड़े, इससे बढ़कर कौन
कर्म लग्न से कीजिए, भाग्य रहे ना मौन
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मच्छर अपने गांव में, खटमल अपनी खाट
कंगाली है जेब में, फिर भी अपनी ठाट
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अपने-अपने प्रेम का, अपना-अपना रोग
कहीं किसी का योग है, कहीं किसी का योग
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महालक्ष्मी जी दीजिए, निर्धन को वरदान
रोटी हो सम्मान की, सिर पर एक मकान
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हत्यारों से प्यार है, तुमसे कैसी बात
आतंकी का धर्म है, क्या मजहब क्या जात
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बुश के सम्मुख कर रहे, मियां मुशरर्फ डांस
हमसे गद्दारी करे, उनसे है रोमांस
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Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
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त्याग शांति सुख सम्पदा, रंगों की पहचान
राष्ट्र पताका में छिपी, भारत भू की शान
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सदा दिवाली संत घर, कभी ना होता द्वन्द
दीप पर्व हो नित नया, आठो पहर आनंद
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समय चक्र से तेज है, जनसंख्या रफ्तार
कैसा होगा साथियों, भारत का उद्धार
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संसाधन सीमित सभी, युवा फिरे बेकार
नई सदी की दौड़ में, हार रही सरकार
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आओ यह संकल्प ले सीमित हो परिवार
शक्तिशाली राष्ट्र का, सपना हो साकार
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जन-जन भारतभूमि का, करे राष्ट्र से प्यार
इस कारण ही कर रहा, कागज काले चार
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पूर्वोत्तार जल रहा, घायल है कश्मीर
मन का दीपक बुझ गया फिर काहे की पीर
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भावुक्त्ता जब से भरी, मन की उड़ी उमंग
नीरज-नीरस जिंदगी, जैसे कटी पतंग
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Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
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दातून नाही दीखती, मंजन है लाचार
टूथपेस्ट बिकने लगा, गली-गली बाजार
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आयुर्वेद को छोड़कर, अंग्रेजी उपचार
आयु छोटी हो गई, खर्चा कई हजार
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लाठी जिसके हाथ है, भैंस उसी के संग
बासमति पर चढ़ गया, अमरीका का रंग
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अस्पताल उद्योग हैं, स्कूलों की भरमार
इससे अच्छा और क्या, दुनिया में व्यापार
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अल्पाहार अंडा हुआ, भोजन मांसाहार
पशु पक्षी भयभीत हैं, कैसा अत्याचार
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मंदिरा ना ही सोमरस, ये कष्टो की ख़ान
बोतल छोटी है मगर, ले लेती है जान
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गुड़ियों जैसा हो गया, नारी का सम्मान
अग्नि परीक्षा ले रहे, कलयुग के भगवान
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