दोहे-2
Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
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त्याग शांति सुख सम्पदा, रंगों की पहचान
राष्ट्र पताका में छिपी, भारत भू की शान
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सदा दिवाली संत घर, कभी ना होता द्वन्द
दीप पर्व हो नित नया, आठो पहर आनंद
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समय चक्र से तेज है, जनसंख्या रफ्तार
कैसा होगा साथियों, भारत का उद्धार
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संसाधन सीमित सभी, युवा फिरे बेकार
नई सदी की दौड़ में, हार रही सरकार
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आओ यह संकल्प ले सीमित हो परिवार
शक्तिशाली राष्ट्र का, सपना हो साकार
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जन-जन भारतभूमि का, करे राष्ट्र से प्यार
इस कारण ही कर रहा, कागज काले चार
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पूर्वोत्तार जल रहा, घायल है कश्मीर
मन का दीपक बुझ गया फिर काहे की पीर
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भावुक्त्ता जब से भरी, मन की उड़ी उमंग
नीरज-नीरस जिंदगी, जैसे कटी पतंग
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