Posted in ग़ज़ल on Jan 29th, 2008 No Comments »
कैसा अजब नज़ारा है
हर घाटी अंगारा है
गली गली ख़ूनी जिसकी
वो कश्मीर हमारा है
किसको समझें हम अपना,
अपनों ने ही मारा है
छोड़ो बातें मौसम की,
हर मौसम हत्यारा है
माँ की आँखों में आँसू,
बेटा जो आवारा है
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Posted in ग़ज़ल on Jan 29th, 2008 No Comments »
घर को आग लगाते हो
और नहीं शर्माते हो
ये हड़तालें, आगजनी
ग़लत राह क्यों जाते हो
भूखा है मज़दूर अगर
क्या उद्योग चलाते हो
कर बिजली, पानी चोरी
अपने महल बनाते हो
अधिकारों की ही चिंता
अच्छा फ़्रर्ज़ निभाते हो
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Posted in ग़ज़ल on Jan 29th, 2008 No Comments »
बोस सभी से न्यारा था
नेता वही हमारा था
ख़ून के बदले आज़ादी
नेताजी का नारा था
गोरे दिल्ली से भागे
उसने जब ललकारा था
सौ करोड़ हम नतमस्तक
प्राणों से भी प्यारा था
नील गगन में चमक रहा
भारत का ध्रुवतारा था
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