प्रहलाद
Jan 29th, 2008 by Rajesh Chetan
घर घर हुए हिरण्याकश्यप
कैसे अब प्रहलाद बचेगा
दुष्ट होलिका हँसती हम पर
कौन होलिका-दहन करेगा
अग्नि परीक्षा प्रहलादों की
लेते अभी हिरण्याकश्यप
अग्नि परीक्षा सीताओं की
होगी कितनी और, परंतप
द्रोण ! अँगुठा एकलव्य को
कब तक और हारना होगा
कब तक राम भेजकर वन में
रावण हमें मारना होगा
कितनी पदमनियों के जौहर
हमको उअर दिखेंगे आखिर
और चिताओं पर विरों की
कब तक हाथ सिकेंगे आखिर
कदम-कदम पर अग्नि परीक्षा
कब तक यह इतिहास रचेगा
घर-घर हुए हिरण्याकश्यप
कैसे अब प्रहलाद बचेगा
आजादी हम जिसको कहते
आधी और अधूरी लगती
लोक व्यवस्था जिसको कहते
हमको वह मजबुरी लगती
कब तक घोड़ों और गधों में
हमें एक को चुनना होगा
कब तक अपनी इस हालत पर
हमकों यूँ सर धुनना होगा
जाति, भाषा औ’ धर्म, प्रान्त ही
हमको आज बड़े लगते हैं
सबसे बड़ा देश को मानें
देखो इतना कब जगते हैं
क्या भारत-माता की चीखें
हमको नही सुनाई देतीं
क्या दुश्मन की शकुनि-चालें
हमको नही दिखाई देती
राष्ट्र देवता के मन्दिर में
कब तक यूँ कोहराम मचेगा
घर-घर हुए हिरण्याकश्यप
कैसे अब प्रहलाद बचेगा
अपने घर की दीवारों को
हमने देश समझ रक्खा है
अपना घर खुश है तो हमने
खुश परिवेश समझ रक्खा है
दुष्ट पड़ोसी की नीयत को
क्यों हम जान नही पाते है
उग्रवाद जैसी चालों को
क्यों पह्चान नहीं पाते हैं
घर की ईंट बचाने को हम
राष्ट्र-भवन को ढहा रहे है
क्षुद्र स्वार्थ की नाली में हम
संस्कृति, गौरव बहा रहे है
भगत सिंह जैसे बालक हों
हमको यह स्वीकार नहीं है
वीर शिवा की गौरव-गाथा
अब शिक्षा का सार नहीं है
आचरणों में परिवर्तन का
भाव हमें क्या नहीं ज़ँचेगा
घर घर हुए हिरण्याकश्यप
कैसे अब प्रहलाद बचेगा
देश-भक्ति के रंगों से अब
होली हमें खेलनी होगी
काश्मीर की व्यथा और अब
हमको नही झेलनी होगी
रंग,अबीर, गुलाल नहीं अब
अपनी माटी हि चन्दन है
इस माटी का तिलक लगाकर
सबको होली अभिनन्दन है
कच्चे रंग अब नहीं चाहियें
पक्के रंगों की होली हो
देश प्रेम के मतवालों की
कदम-कदम अब टोली हो
जाति, भाषा औ’ मजहब की इन
दीवारों को तोड़ गिराओ
वैमनस्य की इस कीचड़ से
प्रेम-भाव के कमल खिलाओ
यही सुत्र अब नव-भारत में
एक नया इतिहास रचेगा
घर-घर हुए हिरण्याकश्यप
कैसे अब प्रहलाद बचेगा