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जय हो तेरी शारदे माँ
हैं सभी तेरे पुजारी
ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने
आरती तेरी उतारी
वेद की पावन ॠचाएँ
तेरे कारण ही सँवरती
सप्त स्वर की दिव्य ध्वनि से
तू धरा की नींद हरती
तेरी वीणा के सुरों में
विश्व मंगल राग गूंजे
शारदे तेरा उपासक
तेरे शुभ चरणों को पूजे
तेरे मन्दिर में यहाँ माँ
काव्य संध्या सज रही है
तेरे हर साधक के स्वर […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 1 Comment »
लाज तुम्हारे हाथ माँ, क्षमा करो हर भूल
जीवन मेरा धन्य हो यदि पाउँ पग-धूल
यदि पाउँ पग-धूल, लेखनी चलती जाए
दो मुझको वरदान यह जीवन सफल कहाए
मीरा,सूर, कबीर के, शीश धरा ज्यों ताज
मैं भी सुत हूँ आपका, रखना मेरी लाज
रखना मेरी लाज, रहूँ मैं सदा ही ‘चेतन’
काव्य-पुष्प नव नित्य करुँ माँ तुम्हें समर्पण
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अभिनन्दन है उन वीरों का
जीवन तिल तिल जला गए जो
राष्ट्र-प्रेम का पाठ पढाकार
हमको जीना सिखा गए जो
आज प्रकाशित दसों दिशाएँ
देव-शक्तियाँ जाग उठी हैं
जाग उठा है सोया भारत
असुर-शक्तियाँ भाग उठी हैं
आओ मिलकर देश-भक्ति की
दीपशिखा को और बढाएँ
आज़ादी लाई है खुशियाँ
घर घर मंगल दीप जलाएँ
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हवा विषैली है पश्चिम की
यहाँ न इसको बहने दो
भारत को भारत रहने दो
घर अपना मत ढहने दो ॥
निज पुरखों ने बलिदानों से
जिसको जग-सिरमौर बनाया
भारत को ‘सोने की चिड़िया’
सारी दुनिया ने बतलाया
मानवता हित पूर्ण विश्व को
हमने गीता-ज्ञान दिया था
जो भी आया, हमने उसको
भाई कहकर मान दिया था
आस्तीन के साँपों! तुमको
हमने गीता-ज्ञान दिया था
जो भी आया, हमने […]
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क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं
आओ साथियों, देशवासियो
भारत तुम्हें दिखाते हैं ॥
जिस गौ को गौमाता कहकर
गाँधी सेवा करते थे
जिसके उर में सभी देवता
वास हमेशा करते थे
हिन्द भले ही मुक्त हुआ हो
गौमाता बेहाल अभी
कटती गऊएँ किसे पुकारें
उनके सर है काल अभी
गौमाता की शोणित-बूँदें
जब धरती पर गिरती हैं
तब आज़ादी की […]
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लन्दन, अमरीकी महलों से
सुन्दर अपनी ही कुटिया है
विश्व गगन में उड़ने वाली
भारत सोने की चिड़िया है
अपनी धरती अपनी माटी
अपनी माँ तो माँ होती है
परदेशी झूठन के ऊपर
देशभक्ति हर दम रोती है
जो कुछ रुखा-सुखा हमको
अपने घर पर मिल जाएगा
उससे ही अपनी धरती पर
खूब ग़ुज़ारा हो जाएगा
अपने प्रतिभाशाली बेटे
अब परदेश नहीं जाएँगे
उनको जो कुछ भी पाना है
राष्ट्र […]
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घर घर हुए हिरण्याकश्यप
कैसे अब प्रहलाद बचेगा
दुष्ट होलिका हँसती हम पर
कौन होलिका-दहन करेगा
अग्नि परीक्षा प्रहलादों की
लेते अभी हिरण्याकश्यप
अग्नि परीक्षा सीताओं की
होगी कितनी और, परंतप
द्रोण ! अँगुठा एकलव्य को
कब तक और हारना होगा
कब तक राम भेजकर वन में
रावण हमें मारना होगा
कितनी पदमनियों के जौहर
हमको उअर दिखेंगे आखिर
और चिताओं पर विरों की
कब तक हाथ सिकेंगे आखिर
कदम-कदम पर […]
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अँग्रेजी सन को अपनाया
विक्रम संवत भुला दिया है
अपनी संस्कृति, अपना गौरव
हमने सब कुछ लुटा दया है॥
जनवरी-फरवरी अक्षर-अक्षर
बच्चों को हम रटवाते हैं
मास कौन से हैं संवत के
किस क्रम से आते-जाते हैं
व्रत, त्यौहार सभी अपने हम
संवत के अनुसार मनाते
पर जब संवतसर आता है
घर-आँगन क्यों नहीं सजाते
माना तन की पराधीनता
की बेड़ी तो टूट गई है
भारत के मन की […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 1 Comment »
महावीर की वाणी से हम,
नवयुग का निर्माण करेंगे
उनके पदचिन्हों पर चलकर,
धरती का कल्याण करेंगे ॥
मन्त्र अहिंसा, महावीर का
गाँधी जी ने अपनाया था
इसी मन्त्र के चमत्कार से
भारत दुनिया पर छाया था
अँग्रेज़ों की इक-इक गोली
सत्याग्रह से शर्मिंदा थी
हिंसा यूँ मर गई सदा को
और अहिंसा ही ज़िन्दा थी
तोप, टैंक बौने लगते थे
हर आयुध बेकार हो गया
धर्म, […]
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लोकतन्त्र का चेहरा कलुषित,
नेता भ्रष्टाचारी है
हम इन धृतराष्ट्रों को ढोएँ,
ऐसी क्या लाचारी है ?
सिंहासन कब तक झेलेगा
लंगड़े-लूले शासक को
आओ मिलकर सबक़ सिखा दें
हर शोषक, हर त्रासक को
रामराज्य के झूठे नारे
आसमान में गूँज रहे
हंसों को बनवास दिलाकर
हम कागों को पूज रहे
गाँधी, नेहरू के चित्रों से
शोभित इनके बँगले हैं
लेकिन उनके आदर्शों पर
निश-दिन इनके हमले हैं
आज विश्व में […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 2 Comments »
जैसे अँग्रेज़ी ही सब कुछ
इसके बिना नही कुछ जैसे
रूस, चीन, जापान, जर्मनी
फिर सबसे आगे हैं कैसे ?
छोटे-छोटे देश गर्व से
अपनी भाषा बोल रहे हैं
एक अभागे हम हैं ऐसे
हिन्दी को कम तोल रहे हैं
सौ करोड़ की इस भाषा का
दुनिया कब सम्मान करेगी
कब भारत की गली-गली से
अँग्रेज़ी प्रस्थान करेगी
हम अँग्रेज़ी को तज देंगे
आओ यह सकल्प उठाएँ
हिन्द निवासी, […]
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हस्ताक्षर तक हम करते हैं
एक विदेशी भाषा में
माना हम आज़ाद हो गए
लेकिन किस परिभाषा में ?
जन्म-दिवस पर केक काट कर
गाते हम अँग्रेज़ी में
शादी-ब्याह तलक की चिट्ठी
छपवाते अँग्रेज़ी में
घोड़ी डोली के स्वागत को
बैण्ड बजा अँग्रेज़ी में
टाई कस कर हर बाराती
ख़ूब सजा अँग्रेज़ी में
सड़को पर हम नाच रहे हैं,
जाने किस प्रत्याशा में ?
माना हम आज़ाद हो गए
लेकिन […]
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अणु-शक्ति के सन्धानों में
भारत की ख़ुद्दारी है
अपने दम-ख़म, अपने बल पर,
जीने की तैयारी है
पास-पड़ौसी जब देखो तब
आँख दिखाने लगते हैं
भाड़े के हथियार उठाकर
रौब जमाने लगते हैं
शान्ति-सुलह का अभिनय करते
सीमा में घुस आते हैं
सन्धि-वार्ता का धोखा दे
हमले करते जाते हैं
सहनशीलता की भी मित्रो !
इक निश्चित हद होती है
हद से ज़्यादा सहन करो तो
दुनिया मे भद होती […]
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बिक सकते हैं कुर्सी वाले
लेकिन देश तुम्हारा है
मत छोड़ो कश्मीर साथियो
माँ ने तुम्हे पुकारा है ॥
कल पुरखों ने दी क़ुर्बानी
शीश चढ़ाए माटी पर
आज हमे भी चलना होगा
बलिदानी परिपाटी पर
आओ मिलकर बलिदानों की
परम्परा की लाज रखें
रक्त चाहिए मातृ-भूमि को
उसकी इच्छा आज रखें
भारत माता की रक्षा का
दृढ़ संकल्प हमारा है
मत छोड़ो कश्मीर साथियो
माँ ने तुम्हे पुकारा है […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
अपनी काली करतूतों से
मिट जाएगा पाकिस्तान
रावलपिन्डी से आगे तक
फिर से होगा हिन्दुस्तान
भारत माता का कन्धा है
जिस पर पापी बैठा है
तुझपे तेरा अपना क्या है
जिस पर इतना ऐंठा है
मार पड़ेगी अबकी इतनी
घर-घर होगा क़ब्रिस्तान
पैंसठ और इकहत्तर को तू
शायद बिल्कुल भूल गया
भीख में कुछ हथियार मिले तो
तू ज़्यादा ही फूल गया
करगिल में इस गद्दारी का,
ब्याज़ सहित भुगता […]
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‘पृथ्वी’-परीक्षण किया जो हमने
तुमने ‘गौरी’ लिया उधार
पाँच धमाकों को सुनकर तो
पड़ गई तुम पर भारी मार
भारत अपने बल-बूते है
तुम इमदाद करो स्वीकार
रोटी तक का दाँव लगाकर
माँगो तुम सबसे हथियार
करगिल-काश्मीर में तुमने
करवाया जो नर-संहार
थू-थू की तुम पर दुनिया ने
सबने दिया तुम्हें दुत्कार
जब-जब छेड़ा तुमने हमको
हमने तुम्हें लगाई मार
अब जो युद्ध हुआ तो होगा
रावलपिन्डी पर अधिकार
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
भारत-भू पर देश भक्ति की
कैसी अलख जगाई है
भारत-माँ के बेटो तुमको
सौ-सौ बार बधाई है ॥
परम शक्ति है पास हमारे
हमने यह दिखलाया है
औ’ कम्प्यूटर में भी हमने
भारी नाम कमाया है
सी टी बी टी वालों को भी
हमने ही धमकाया है
भारत के गौरव का झण्डा
दुनिया पर फहराया है
हिन्दुस्तानी वैज्ञानिक ने
कैसी धूम मचाई है
भारत-माँ के बेटो तुमको
सौ-सौ बार बधाई […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
बाबा साहब भीम राव जी
संविधान-निर्माता थे
हरिजन्, गिरिजन, दलितजनों के
सच्चे भाग्य विधाता थे
भारत जैसा लोकतन्त्र कब
इस दुनिया में दूजा है
बाबा साहब ने इसको ही
इष्ट बनाकर पूजा है
आओ उनके आदर्शों का
मिलकर हम सम्मान करें
ऊँच-नीच का भेद मिटाकर
भारत का निर्माण करें
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
अग्र-शिरोमणि अग्रसैन ने
अग्रोहा निर्माण किया था
एक रूपैया, एक ईंट से
नवयुग का आह्वान किया था
अपने पावन दिव्य-तेज से
कैसा सुन्दर बाग़ लगाया
महक रहा है सारा भारत
पाकर जिसकी अनुपम छाया
दान, दया, करूणा के सागर
हे भारत के भाग्य-विधाता
युगों युगों से गुँज रही है
तेरे पुत्रों की यश गाथा
हे महाराजा अग्रसैन जी
अभिनन्दन स्वीकार कीजिए
जीत सकें हम जन मानस को
हमको यह वरदान […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
क्या क़ीमत है आज़ादी की
हमने कब यह जाना है
अधिकारों की ही चिन्ता है
फर्ज़ कहाँ पहचाना है
आज़ादी का अर्थ हो गया
अब केवल घोटाला है
हमने आज़ादी का मतलब
भ्रष्टाचार निकाला है
आज़ादी में खा जाते हम
पशुओं तक के चारे अब
‘हर्षद’ और ‘हवाला’ हमको
आज़ादी से प्यारे अब
आज़ादी के खेल को खेलो
फ़िक्सिंग वाले बल्लों से
हार के बदले धन पाओगे
‘सटटेबाज़ों’ दल्लों से
आज़ादी […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
निगम पार्षद नोट कमाता
एम एल ए विश्वास गँवाता
सांसद अपना शर्मिन्दा है
लोकतन्त्र फिर भी ज़िन्दा है ॥
व्यवसायी हर टैक्स बचाता
अध्यापक ट्यूशन की खाता
पत्रकार इक कारिन्दा है
लोकतन्त्र फिर भी ज़िन्दा है ॥
डाँक्टर भारी लूट मचाता
अभियन्ता अभियान चलाता
बेघर हर इक बाशिन्दा है
लोकतन्त्र फिर भी ज़िन्दा है ॥
है किसान क़िस्मत का मारा
नेताओं में बँटता चारा
रिश्वतख़ोरी ताबिन्दा है
लोकतन्त्र फिर भी […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
ख़ूब निभाया नेताओं ने भाई चारा है
इन्हें विदेशी भाई चारा बेहद प्यारा है
सन् बासठ में हिन्दी-चीनी भाई चारा था
‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ गूँजा नारा था
चाओ, माओ भाई-भाई कहते चढ आए
चुपके चुपके भारत की सरहद में बढ आए
और हज़ारों वर्गमील धरती को दाब लिया
तिब्बत को तो पूरे का पूरा ही चाब लिया
विश्व शान्ति का […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
विश्व जीतने वाला घोड़ा हमने ही तो छोड़ा है
परमाणु से हमने जग को मैत्री युग से जोड़ा है
अमेरिका भी हमको अपने घर पर आज बुलाता है
रुस हमारे घर पर आकर समझौता कर जाता है
अप्ने डाँक्टर वैज्ञानिक तो दुनिया भर में छाये हैं
कम्प्यूटर में हमने जग के कीर्तिमान बनाये हैं
विश्व जीत कर जिस दिन भारतवासी घर […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
भारती के भाल का सम्मान वन्देमातरम्
देश हित की भावना का मान वन्देमातरम्
जब कभी भी इस धरा पर कोई संकट आ पड़े
मंत्र सम है गूँजता वरदान वन्देमातरम्
भिन्न भाषा, भिन्न भूषा, भिन्न इसकि बोलियाँ
भिन्नता में एकता पहचान वन्देमातरम्
इस गगन में अब लहरता राष्ट्र का झण्डा अमर
इस तिरंगे की अमिट है शान वन्देमातरम्
अब करोड़ों हाथ अपने राष्ट्र को […]
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Posted in कविताएँ on Jan 29th, 2008 No Comments »
पूजा करो सभी की, लेकिन
प्रथम देवता देश को मानो
देश बड़ा है सब धर्मों से
इस सच्चाई को पहचानो
अपने नेता ज़ोर-ज़ोर से
मन्दिर-मस्जिद चिल्लाते हैं
इन नारों के दम पर ही तो
ये संसद में आ पाते हैं
मन्दिर वाले वोट मिलेंगे
जाति-वाद के अंगारों से
मस्ज़िद वाले वोट मिलेंगे
हिन्दू-मुस्लिम दीवारों से
देश-प्रेम कैसा, जब नेता
कुर्सी पर जाएँ बलिहारी
तुझको फिर से आना होगा
भारत-भू पर […]
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Posted in कविताएँ on Sep 6th, 2007 1 Comment »
पोखरण में
परमाणु के विस्फोट करने वाला
एक कुंवारा
जो विज्ञान को ही
स्वपन सुंदरी मानकर
प्यार करता रहा
अपने आविष्कारों पर ही मरता रहा
हेयर कटिंग सेलून
जाने से भी डरता रहा
जो जवानी में पति ना
बनने के लिये तन गया
वह बुढ़ापे में
राष्ट्रपति बन गया
और जाते जाते कैसी
परम्परा जोड़ गया
खुद पुनः शिक्षक
तथा हिन्दुस्तान को
शिक्षा देने के लिये
एक महिला को
राष्ट्रपति भवन
छोड़ गया
विधि का खेल […]
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Posted in कविताएँ on Jul 14th, 2007 1 Comment »
टैंशन, टैंशन, टैंशन
बास की टैंशन
लास की टैंशन
राशन की टैंशन
टयूशन की टैंशन
बीबी की टैंशन
बच्चों की टैंशन
पडोसी की टैंशन
मौसी की टैंशन
बिल की टैंशन
दिल की टैंशन
हेल्थ की टैंशन
वेल्थ की टैंशन
अगर रहेगी टैंशन तो
बीबी खायेगी पैंशन
टैंशन फ्री आन्दोलन अपनाओ
कम खर्चे में काम चलाओ
पडोसी की खुशहाली देख मुस्कराओं
बाबा रामदेव के योग शिविर में जाओ
टैंशन फ्री पत्रिका घर मंगवाओ
जोर जोर से […]
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Posted in कविताएँ on Jul 11th, 2007 No Comments »
वैश्वीकरण छा रहा है
डायना की मौत से ये समझ आ रहा है
जर्मनी की कार में
अंग्रेजों की रानी
इजेपेटियन बाय फ्रेंड
डच ड्राईवर तथा
फ्रांस के मोड़ से टकराना
इसे कहते है
ग्लोबलाईजेशन का जमाना
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Posted in कविताएँ on May 30th, 2007 1 Comment »
धोती बांधने के आग्रह पर
केरल के मंदिर में
नेहरू जी द्वारा
आग बबूला हो जाना
और निज़ामुद्दीन की दरगाह पर
प्रसन्नता पूर्वक टोपी लगाना
इसी का नाम है
धर्मनिरपेक्षता निभाना
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Posted in कविताएँ on May 25th, 2007 2 Comments »
हिन्दु मुस्लिम सिक्ख ईसाई
एक ट्रक पर सवार
कर रहे थे तिरंगे झण्डे पर विचार
हिन्दु ने कहा -
हम हैं गाँधी के बेटे लायक
अहिंसा के नायक
वन्देमातरम् के गायक
छोड़ चुके हैं केसर की घाटी
क्योंकि हमको प्यारी है भारत की माटी
हम हैं भारत पर कुरबान
इसलिये ये रंग केसरिया हमारी शान।
मुस्लिम ने कहा -
हरा यानी हरियाली
हरियाली है तो खुशहाली
खुशहाली है तो […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
बहुत ठंड थी उस रात
पिताजी आये मेरे पास और बोले
ले बेटा देख ये चित्र
चुन लिया है हमने तेरा जीवन मित्र
मै चौका, पिता ने टोका
लाखें में एक है।
यूं तो अपने पिता पर पूर्ण विश्वास था
पापी मन लाचार था
सोचते विचारते पहुंचे उसके द्वार
शायद उसको भी था इन्तजार
हाथ मे चाय की ट्रे उठाये
शर्माये सकुचाये
दो सखियों के साथ
धीरे धीरे […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 1 Comment »
अहिंसा अवतार
भगवान महावीर
आपका 2600 वाँ
जन्म कल्याणक मनाकर भी
हम शर्मिन्दा हैं
क्योंकि आपकी
अंहिसा मर रही है और
हिंसा अभी जिंदा है
बडे धूम-धाम से मनाया
हमने आपका जन्म कल्याणक वर्ष
आतंकियों में छाया रहा पूरा हर्ष
ओसामा के धमाके
संसद में लड़ाके
कश्मीरी अंगारे और
गोधरा के हत्यारे
मानवता को चाट रहे हैं और
कुछ धर्मों के ठेकेदार
दुनियाँ को डाँट रहे हैं
आपके भक्तों ने व सरकार ने
किया […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 1 Comment »
निर्दोषों की हत्या को जो अपना धर्म बताते हैं
जेहादी नारों के दम पर द्वेष घृणा फैलाते हैं
जिनके फतवों के कारण धर्म आज शर्मिन्दा हैं
मानवता का हत्यारा ओसामा जब तक जिन्दा हैं
नापाक मदरसों में पढ़कर ये तालिबानी आये हैं
जिनके कारण आज विश्व में काले बादल छायें हैं
उग्रवाद की घटनाओं को अगर धर्म से जोड़ोगे
मानवता से धर्म […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
तालिबान में
बुध्द की प्रतिमायें तोडने वालों
अल्लाह तुम्हे माफ करे
मिटा सकते हो तो मिटाओ
कोटी कोटी ह्रदयों में बसने वाले
उस बुध्द को
पत्थरों पर
बहादुरी दिखाने वालो
कायरों !
तुम्हारी कायरता ने
किया है करोडो ह्रदयों को घायल
कौन से धर्म का
परचम फहराना चाहते हो तुम
तुम्हारे अज्ञान ने
अपमानित किया है धर्म
धर्म का आवरण छोडें
ज्ञान से अपने को जोडें
बुध्द की शरण में जायें
बुध्द हो […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
हिन्दु मुस्लिम दीवारों को
जिसने तोड गिराया था
ननकाना में जन्म लिया
नानक नाम कहाया था
मुगलों के अत्याचारो से
जन जन मन घबराया था
गुरु चरणों में आकर के
बाबर ने शीश झुकाया था
गुरु नानक ने मानवता की
घर घर अलख जगाई थी
जिसके कारण ही भारत में
नई रोशनी आई थी ।
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 1 Comment »
गान्धी जी के तीन बंदर
बुरा ना बोलो
बुरा ना सुनो और
बुरा ना देखो का संदेश गुंजाते है.
भारतीय मीडीया पर
इसका इतना गहरा असर पाते हैं
इनको केवल
बुरा ही दिखता है
बुरा ही सुनता है
और बुरा बोलना तो
इनका अधिकार है
क्योंकि
भारतीय मीडिया समाज का दर्पण नही
एक बाजार है।
बाजार यानी प्रदर्शन
प्रदर्शन यानी दिखावा
सच्चाई के साथ छलावा।
कुछ न कुछ बोलना
देश की बखिया उधेड़ना
सुर्खियाँ […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
कभी मुनि नथमल
आज महाप्रज्ञ।
आँखो से देखता हँ तो संत
कानों से सुनता हँ तो मनीषी और
पढ़ता हँ तो दार्शनिक लगते हैं।
”अक्षर को प्रणाम” काव्य संग्रह ने
एक नया इतिहास गढ़ा जब
उनको एक कवि के रूप में पढ़ा।
ये कवितायें नही
मन्त्र हैं, अनुष्ठान है
इनमें संगीत है, तान है
प्रेक्षा है, ध्यान है
अंहिसा का ज्ञान है
सत्य की गहराई है क्योंकि
ये कवितायें […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
महिला-आरक्षण पर
हो रही थी खुलकर चर्चा
कुछ महिलायें पढ रही थी पर्चा
सब के अपने तर्क और जबाब थे
कुछ के तो अलग ही अन्दाज थे
अंत में पत्नी पीडित अध्यक्ष बोले
जागरूकता बहुत जरुरी हैं
क्योंकी ये भारतीय लोकतन्त्र की मजबूरी हैं
जो महिला जागरूक होती हैं
पति से लडती हैं
ज्यादा जागरूक होती हैं
पडोसी से लडती हैं
और सर्वाधिक जागरूक महिला
चुनाव लडती हैं
इसलिये […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
हिमालय यानि
ईश्वर द्वारा भारत को मिला वरदान
मां गंगा का उदगम स्थान
आयुर्वेद की खान
वैदिक व बौध्द संस्कृति का गुणगान
भारत मां के माथे की शान
नगपति महान
घायल है
जातिवाद-भाषावाद, आंतकवाद की छाया
तस्करों की माया
धर्मान्तरण का मक्क्डजाल
और दुश्मनों की कदम ताल
हिमालय पर जारी है
ये भारत के साथ
बहुत बडी गद्दारी है
हिमालय यानि भारत
भारत यानि हिमालय
भारत को बचाना है तो
हिमालय को बचाओ
सांस्कृतिक […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
जिस प्रकार माँ सन्तानों से करती हरदम निश्छल प्यार
सुखपूर्वक बड़ा हो गय धरती माता का उपकार
हिन्दुभूमि हे मंगलकरणी पुण्यभूमि महिमा महान
तेरी […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
पुणे यानी
उत्सव की बहार
आत्मा का श्रृंगार
जीवन का गीत
मन का संगीत
ओशो की वाणी और
प्यार की कहानी है, इसलिये
पुणे विश्व की राजधानी है ।
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
दूरदर्शन का छोटा पर्दा उंगली ऊपर सदा मचलता
एक नहीं दो नहीं सैंकड़ो चैनल अदला बदला करता
शक्तिशाली इस डिब्बे में घूम रही आकाश तरगें
बचपन इसमें आज भटकता यौवन है बेडोर पतगें
सब चैनल अडल्ट हो गये रिश्तों की मर्यादा टूटी
बच्चों के संग क्या हम देखें परिवारों की किस्मत फूटी
जोड़ सके जो इस माटी से डब्बा ऐसा राग […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
मैत्रीभाव से जिसने जग में
सबको अपने गले लगाया
सदा मिली है उसको जग से
प्रेम वृक्ष की निर्मल छाया
दो शब्दों का चमत्कार ये
जिसने हमको मोड़ दिया है
क्षमाधर्म की महिमा देखो
जिसने हमको जोड़ दिया है
जाने या अनजाने मुझसे
कभी किसी ने कष्ट उठाया
नतमस्तक हूँ क्षमा कीजीये
क्षमाभाव का शुभ दिन आया ।
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
बहन ने भाई को पुकारा
आ गया
रक्षाबन्धन का त्यौहार दोबारा
फिर वहीं औपचारिकतायें
रेशम का धागा,टीका मिठाई
तुमने भी जेब मे हाथ डाला
रस्म निभाई
हो गया, रक्षाबन्धन
भैया!
ये साधारण से दीखने वाले
रेशम के धागे
धागे नही
रक्षा के बन्धन हैं
और तुम्हारे माथे पर
चमकने वाली ये रोली
रोली नही
भारत की माटी का
पावन चन्दन हैं
बहन की रक्षा का
पावन संकल्प उठाया है तुमने
तुमको बधाई
पर तुम्हारी बहन
तुमको इतनी […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
मेरे एक मित्र हैं पदमेश
रहते हैं विदेश
करते हैं कविताई
एक दिन चिटठी आई
लन्दन आओ, कविता सुनाओ
हमने सोचा, किस्मत ने भी कैसा मंत्र है मारा
इसलिए भारत में प्रतिष्ठा पाने को
हमने तुरन्त ये आमंत्रण स्वीकारा
क्योंकी भारत में जब तक विदेश ना जाओ
कोई जानता ही नही
होगें आप महाकवि
पर कोई मानता ही नही
राम-रामा
कृष्ण-कृष्णा
योग-योगा और
आयुर्वेद आयुर्वेदा बनकर
जब भारत में प्रतिष्ठा पा […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
हंसना और हंसाना मित्रों मुझको भी तो आता है
द्विअर्थी संवादों से मन मेरा घबराता है
भौंडे फिल्मी गाने सुनना हमें सुहाना लगता है
सँस्कारों की अर्थी पर फूल चढाना पड़ता है
पश्चिम का ये नंगापन हमको तो स्वीकार नही
इस बेशर्मी का सब मिलकर करते क्यों प्रतिकार नही
युवा पीढी बरबादी से मन मेरा जब डरता है
वातावरण देखकर मुझको आग […]
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Posted in कविताएँ on Apr 21st, 2007 No Comments »
हिन्दु दर्शन का पावन झण्डा
दुनिया में फहराया था
राम कृष्ण परमहंस को
अपना गुरु बनाया था
दीन दुखी भारतवासी पर
अपना प्यार लुटाया था
सेवा को ही मिशन बनाकर
सबको गले लगाया था
विश्व पटल पर भारत भू की
जिसने धूम मचाई थी
भारत माँ के इस बेटे ने
माँ की लाज बचाई थी ।
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