मुक्तक-2
Apr 21st, 2007 by Rajesh Chetan
| ———————————————- जहाँ कहीं भी नई रोशनी छाई है जहाँ कही भी जीवन की सच्चाई है दुनिया वाले चाहे उसको धर्म कहे सच कहता हूँ भारत की परछाई है ———————————————- आशा और विश्वास चाहिये जीवन में मधुमास चाहिये दिन गिनती करने से क्या है पिया मिलन की प्यास चाहिये ———————————————- होती ध्यान योग परिचर्चा भारत है नियोजन से होता खर्चा भारत है कट्टरता को हमने कब स्वीकार किया खुले रूप से ईश्वर अर्चा भारत है ———————————————- |
———————————————- कभी कभी होती मुझको हैरानी है कवियों की भी ये कैसी नादानी है जापानी जूते के संग रूसी टोपी बोल रहे हैं दिल तो हिन्दुस्तानी है ———————————————- हिन्दुस्तान के हम हैं मित्रों हिन्दी भाषी हैं सत्य अहिंसा मानवता के हम विश्वासी हैं राम कृष्ण गौतम के वंशज दुनिया वाले जाने भारत शक्ति दिल में अपने हम प्रवासी हैं ———————————————- जुंबा भले लठमार हमारा हरियाणा दिल में रहता प्यार हमारा हरियाणा दूध दही की नदियां कल कल कहती हैं रोज रोज त्यौहार हमारा हरियाणा ———————————————- |