मुक्तक-5
May 30th, 2007 by Rajesh Chetan
| ———————————————- धर्म दुकानों का जिसने प्रतिकार किया वेदों को ही जीवन में स्वीकार किया शत् शत् वन्दन ॠषि दयानन्द को करते आर्य समाज को भारत में साकार किया ———————————————- नकली नकली ही सारा व्यवहार मिला अंग्रेजी में सारा कारोबार मिला विमानों में हिन्दी का सम्मान नहीं सीट सीट पर अंग्रेजी अखबार मिला ———————————————- द्वेष की बढती लहर आरक्षण है प्रतिभाओं पर बढता कहर आरक्षण है नेताओं ने इस कदर बाटाँ है समाज को जातियों में बढता जहर आरक्षण है ———————————————- |
——————————————————- वोट बैंक का राग हमारे भारत में खून हो गया फाग हो गया भारत में कुर्सी वाले मिलकर देखो लगा रहे आरक्षण की आग हमारे भारत में ——————————————————– रोज दिये से जलते रहो फूलों के सम खिलते रहो दुनिया है घर के बाहर जीना है तो मिलते रहो ——————————————————– फुटपाथों पर रहने वाले दिल्ली में जोर जोर से कहने वाले दिल्ली में संसद की कैन्टीन अय्याशी में डूबी भूखे ही सो जाने वाले दिल्ली में ——————————————————- |