मुक्तक-7
Jun 13th, 2007 by Rajesh Chetan
| ———————————————- देहरी उपर दीप जलाना अच्छा है अन्धकार को दूर भगाना अच्छा है बाहर लाखों दीप जले हैं जलने दो भीतर मन का दीप जलाना अच्छा है ———————————————- प्यार मीरा प्यार राधा प्यार ही रसखान है प्यार जिसको हो गया महकता इन्सान है नफरतों को छोड़ बन्दे प्यार करना सीख ले प्यार जिसने पा लिया तो पा लिया भगवान है ———————————————- दिल से दिल की बढ़ती जाती दूरी है शादी है तो बंधन बड़ा जरूरी है एक छत नीचे दोनों को रहना होगा ये तो अपने भारत की मजबूरी है ———————————————- |
——————————————————- प्याऊ मंदिर विद्यालयों का जाल बिछाया हरिजन गिरिजन सबको अपने गले लगाया कुल देवी लक्ष्मी का वरदान मिला तो पुण्य कमाई को हमने प्रसाद बनाया ——————————————————– आरती सरस्वती माता की जिसको नहीं सुहाती है भारत भू की गौरव गाथा जीभ नहीं गा पाती है हो सकता है बहुत बड़ा हो पर भारत का भक्त नहीं कलाकार उसको कहने में शर्म बहुत ही आती है ——————————————————–— जो कर गये शीश का दान आओ दें उनको सम्मान यमुना तट ये बोल रहा भूल गये उनका बलिदान —————————————————- |