मुक्तक - 8
Posted in मुक्तक on Nov 1st, 2007 No Comments »
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भूखी ये जनता रोटी से दूरी है
नंगा है तन कपड़ा जरूरी है
जनता की आंखों में जब तक हैं आंसू
आजादी समझो तब तक अधूरी है
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साजिशें चहुंओर दिखाई देती है
दिल्ली कुर्सी चोर दिखाई देती है
न्यायालय में सरकारी साजिश देखी
संसद भी कमजोर दिखाई देती है
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शत्रु सम्मुख डटे रहे और हार कभी ना मानी
आजादी के लिये दे गये जो […]