मुक्तक - 8
Nov 1st, 2007 by Rajesh Chetan
| ———————————————- भूखी ये जनता रोटी से दूरी है नंगा है तन कपड़ा जरूरी है जनता की आंखों में जब तक हैं आंसू आजादी समझो तब तक अधूरी है ———————————- साजिशें चहुंओर दिखाई देती है दिल्ली कुर्सी चोर दिखाई देती है न्यायालय में सरकारी साजिश देखी संसद भी कमजोर दिखाई देती है —————————————————— शत्रु सम्मुख डटे रहे और हार कभी ना मानी आजादी के लिये दे गये जो अपनी कुरबानी उनके चरणों में है शत शत वंदन नमन हमारा आओ मिलकर गायें उनकी गाथाएँ बलिदानी ———————————— |
——————————————— संवेदनाये मर गई फिर से जगाओ पड़ोस की झोपड़ी में भी दीप जलाओ अहिंसा को दुनिया में लाना है तो गरीब नहीं गरीबी मिटाओ ———————————- खादी पहने घूम रहे मक्कारों को कौम के दुश्मन वोट के ठेकेदारों को राम की महिमा नहीं दिखाई दे जिनको सेतु के उस पार करो गद्दारों को ———————————————— शत्रु सम्मुख डटे रहे और हार कभी ना मानी आजादी के लिये दे गये जो अपनी कुरबानी उनके चरणों में है शत शत वंदन नमन हमारा आओ मिलकर गायें उनकी गाथाएँ बलिदानी ————————————- |