Posted in साप्ताहिक कालम on Mar 6th, 2005 No Comments »
खेत और खलिहानों ने गीत नया गाया है
भारत मे देखो नव सम्वत्सर आया है
वासंती मौसम है , ईश्वर की माया है
भारत मे देखो नव सम्वत्सर आया है
हमने बही खातों को फिर से सजाया है
भारत मे देखो नव सम्वत्सर आया है
छात्रों को पाढ़ नया गुरू ने सिखाया है
भारत मे देखो नव सम्वत्सर आया है
दुर्गा के भक्तों […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Feb 27th, 2005 No Comments »
मचा हुआ हुडदंग साथियों होली में
नेता हैं बदरंग साथियो होली में
दुनिया का दादा अमरीका होता है
मोदी जी से तंग साथियो होली में
आतंकवादियों ने घायल नेपाल किया
माओवादी जंग साथियो होली में
युद्ध नही अब क्रिकेट से ये […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Feb 20th, 2005 No Comments »
सत्ता का हुडदंग हमारे भारत में
नेताओं की जंग हमारे भारत में
हरियाणा में भजनलाल गिरगिट जैसे
बदल रहे हैं रंग हमारे भारत में
झारखंड में संविधान को फूंक दिया
राज्यपाल बदरंग हमारे भारत में
पासवान ने तोड दिया गठबंधन को
लालू मैडम संग […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Feb 13th, 2005 No Comments »
चिदंबरम का बजट
वोटर को रिझाता है क्योंकि
बिहार-झारखंड चुनाव के बाद
यू पी ए गठबन्धन
संकट में नजर आता है।
सोनिया हो या शिबु
लालू हो या पासवान
सबके लिये कुर्सी महान।
लोकतन्त्र के लिये गठबन्धन
एक नाजायज भाईचारा है क्योंकि
जनता ने तो सबको ही नकारा है।
चुनाव में तलवार
सरकार में प्यार
गठबन्धन की जय जयकार।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Feb 6th, 2005 No Comments »
कश्मीर में बर्फ
पाक से रिश्तों में गरमाहट
क्रिकेट का कमाल
बस यात्रा का बबाल।
वाजपेयी भी जब
पाक रिश्तों की पिच पर
हो गये आऊट तो
मनमोहन जी हम आप पर
क्यों ना करें डाऊट।
अर्थशास्त्री जी
पड़ोसी को रिश्तों का अर्थ समझाओ।
अगर पाक नापाक हरकतें छोड
मानव धर्म निभायेगा तो
मध्य एशिया में
शांति का एक नया युग आयेगा।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jan 30th, 2005 No Comments »
राजधानी दिल्ली
कोई शहर नही
कंकरीट का जंगल है और
बढ़ती आबादी का दंगल है।
मुख्यमंत्री को बधाई
समस्या समझ तो आई।
वोट का मोह छोड़
मिलकर करें समस्या समाधान तभी
हम कह सकेगें
मेरी दिल्ली मेरी शान।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jan 23rd, 2005 No Comments »
तिब्बत के बाद
लाल झन्डा लेकर
चीन का माओवादियों के वेश में
नेपाल आना।
पाकिस्तान द्वारा
षड्यंत्र करके
शाही परिवार की हत्या करवाना।
प्रजातन्त्र की हत्या के नाम पर
भारत का घडियाली आंसू टपकाना,
पडोसी पर संकट
आपकी चुप्पी और लाचारी, तो
कल होगी आपकी बारी।
पशुपति नाथ शंकर हो या
मिथिला की सीता
रामायण हो या गीता,
नेपाल भारत और
भारत नेपाल है
समझ नही आता भारत में
राजनीति का ये कैसा […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jan 16th, 2005 No Comments »
गांधी को किसने मारा?
बहस जारी है
अर्जुन सिंह के अभारी हैं,
भले ही अदालत ने
उनको जमानत पर छोड दिया परन्तु
मुद्दा एक नई दिशा में मोड दिया।
गांधी को मारा हत्यारों ने
गांधीवाद को मारा गांधी के प्यारों ने
सत्य अंहिसा का आचार
स्वदेशी का विचार
गौमाता से प्यार
हिन्दी का संस्कार
भारत से कोसो दूर है
गांधीवाद कितना मजबूर है।
अर्जुन जी! भले ही
गांधी हत्यारों को
फांसी […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jan 9th, 2005 No Comments »
कहते हैं
सितारों के आगे भी जहाँ हैं, पर
किसने देखा?
अजब है ये फिल्म सितारों का लेखा
कभी सफलता का खुला आकाश
तो कभी अपमान का एकान्त वास।
परवीन बॉबी की फिल्म देख
झूमने वाला हर दर्शक
इस मौत पर खामोश है
आखिर ये किसका दोष है?
जब सितारों का ये हाल है तो
आम आदमी तो बेहाल है पर
आम आदमी के साथ खडा है
एक […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jan 2nd, 2005 No Comments »
गणतन्त्र या रिपब्लिक
प्रजातन्त्र या लोकतन्त्र
मतलब साफ है,
अब राजाओं का नही
जनता का राज है, परन्तु
जनता का अपने ही तन्त्र पर
क्रोध बढ़ता जा रहा है और
मतदान का प्रतिशत
लगातार घटता जा रहा है।
जाति धर्म को नही
देश को करें मतदान, और
सब मिलकर कहें
हमारा गण्तन्त्र महान।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Dec 26th, 2004 No Comments »
जयेन्द्र सरस्वती को बेल
विजेयन्द्र सरस्वती को जेल
कैसा है? अम्मा का खेल
आखिर अम्मा है
तमिलनाडू की राजा
बजा सकती है
सुप्रीम कोर्ट का भी बाजा।
कांची पीठ में
पूजा के समय
पुलिस की कदम ताल
धर्म का अपमान है
कैसे कहें कि
मेरा भारत महान है।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Dec 19th, 2004 No Comments »
प्रधानमंत्री ने कहा
विदेश से दान नही
मान चाहिये
सहयोग के लिये
विदेशी मित्रो का आभार।
वास्तव मे भारत है-
एक बड़ा परिवार।
सौ करोड़ का भारत
दु:ख में एक साथ खड़ा है
इसलिये दुनियाँ की नजरो में
सबसे बडा है।
सुनामी पीड़ितो के प्रति
दान नही
दायित्व का बोध जगाओ और
मानवता की सेवा के लिये
मिलकर कदम बढाओ।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Dec 12th, 2004 No Comments »
सुनामी समुद्री तूफान
लील गई हजारों लोगों की जान।
विज्ञान का विकास
पहुंच गया चाँद तक, परन्तु
धरती के रहस्यों से दूर है,
आदमी कितना मजबूर है।
हमने प्रकृति को पूजा
शक्ति को स्वीकारा
प्रकृति माँ देती रही सहारा।
अगर अन्धा मनुष्य
कुदरत का दोहन यूं ही करेगा तो
प्रकृति के प्रकोप से कैसे बचेगा?
जीओ और जीने दो का मंत्र गुंजायें
प्रकृति से मैत्री निभायें।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Dec 5th, 2004 No Comments »
लालू की एफ. आई. आर.
चुनाव आयोग को नमस्कार।
अपने पेट को चारा
वोटर को मिठाई
लालू की लीला
समझ नही आई।
बिहार के राजा
यू. पी. ए. के महाराजा
कौन बजा सकता है?
आपका बाजा।
इस चुनाव मे लगता है
लालटेन में तेल नही पानी है
अत: हार ही लालू की कहानी है।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Nov 28th, 2004 No Comments »
शोरुम का
उद्धाटन फीता काटते काटते
तुलसी बहू ने जोश दिखाया और
गुजरात की धरती पर
नरेन्द्र भाई को धमकाया।
चुनावी हार के बाद, भले ही
मोदी खलनायक व
अटल जी उनके नायक हैं, परन्तु
बहू जी।
नाटक में ही होता है विलेन
राजनीति में तो सभी हीरो हैं अत:
राजनीति खेल में आप जीरो हैं।
स्मृति जी
अभ्यास के बिना
राजनीति के गीत मत गाओ और
अभिनय मे ही […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Nov 21st, 2004 No Comments »
पोटा को हटाना
घाटी में सेना को घटाना
देश के हालात
सामान्य हो रहे हैं, और
मनमोहन जी
सुदर्शन चक्र छोड
बांसुरी की धुन में खो रहे हैं।
आतंकी खेल जारी है
समझ नही आया
दिल्ली की क्या लाचारी है।
मोहन जी,
अमरीका से मैत्री निभाओ, पर
राष्ट्र का स्वाभिमान तो बचाओ।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Nov 14th, 2004 No Comments »
रिलायंस का
मतलब होता है सच्चा विश्वास
धीरू भाई ने लोगों को समझाया और
कम्पनी का झन्डा
दुनिया में लहराया।
आज जब अम्बानी परिवार में ही
अविश्वास का साया है तो
जनता का विश्वास डगमगाया है।
मुकेष-अनिल अम्बानी
भाई-भाई का प्यार ही तो है
रामायण की वाणी।
रामायण पढो तथा
देश व जनता के लिये
मिलकर आगे बढ़ो।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Nov 7th, 2004 No Comments »
हरियाणा के
राजनीति उद्योग को नमन
आजकल संकट में है
चौटाला का खिलता चमन।
ताऊ का बेटा चौटाला
भजनलाल की परम्परा
निभा रहा है
काग्रेंस को क्रोध आ रहा है।
बन्सी के लाल सुरेन्द्र
भजन के लाल कुलदीप-चन्द्र
चौटाला के लाल अभय-अजय
ये सब पारिवारिक दुकान है
कैसे कहे कि हरियाणा महान है।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Oct 31st, 2004 No Comments »
ईद और दीवाली पर
धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने
किया है कमाल।
मुस्लमानों के लिये
पार्टी रोजा इफ्तार और
हिन्दुओं के शंकराचार्य गिरफ्तार।
शंकराचार्य कोई शरीर नही
हिन्दुओं की आस्था का प्रतिमान है।
यह शंकराचार्य का नही
हिन्दू समाज का अपमान है और
आजकल भारत में
हिन्दू का अपमान ही
धर्म निरपेक्षता का सम्मान है।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Oct 24th, 2004 No Comments »
लादेन ने
अमरीका को फिर धमकाया,
ग्यारह सितम्बर याद कराया,
अमरीकी चुनाव में
बुश और कैरी के बीच
लादेन का टपकना
अच्छा है,
देखें अमरीकी जनता के लिये
कौन सच्चा है।
बुश का लादेन प्रेम या
कैरी के विचार
देखें अमरीकन जनता
किसको करती हैं स्वीकार?
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Posted in साप्ताहिक कालम on Oct 17th, 2004 No Comments »
महामहिम खुराना यानी
शेर ए दिल्ली
भाजपा हाईकमान ने
बना दिया था बिल्ली।
शाही सोने का पिंजरा और
दिल्ली का दु:ख,
कैसे उठाते राजमहलों का सुख?
नींद की गोली से भी
जब नहीं बनी बात तो
सिंहासन को मार दी लात।
अब दिल्ली भाजपा के दिग्गज
कुछ घबराये हैं क्योंकि
लौट के बुध्दू घर को आये हैं।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Oct 10th, 2004 No Comments »
महाराष्ट्र का चुनाव
डूब गई ठाकरे जी की नाव
शिवसेना का मराठावाद
भाजपा का सावरकर विवाद
माया का जातिवाद
मुलायम का अवसरवाद
जनता ने किया अस्वीकार और
जीत गये शरद पवार
तेलगी के तेल को भी
काग्रेंसी नेताओं ने
कुशलता से पचाया और
महाराष्ट्र में झण्डा लहराया
ठाकरे जी!
अपनी कसम तोडो
और केवल महाराष्ट्र ही नही
समस्त भारत को जोडो।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Oct 3rd, 2004 No Comments »
गांधी के देश मे
कबाडे मे विस्फोट से
दस लोगों की मौत के बाद
कबाडियों की खुल गई पोल।
कबाडे में मिल रहे हैं
जिंदा राकेट और उसके खोल।
सस्ते के चक्कर में
उद्योगपतियों को
दुनिया भर का कूडा स्वीकार है
पर कबाडे में
कीमती हथियारों का मिलना
एक चमत्कार है।
कमाऊ बेटों के कारण
धृतराष्ट्र बना प्रशासन मौन है
देश को बतायें
इस साजिश के पीछे कौन है?
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Posted in साप्ताहिक कालम on Sep 26th, 2004 No Comments »
मार्क्सवादियों का
बहुत बहुत आभार
काग्रेंस को बना दिया हैं बिल्कुल बेकार।
विदेशी के सवाल पर
सोनिया का प्रधानमंत्री बनने से घबराना,
विदेशी कम्पनियों के मामले में
चिदंबरम को धमकाना,
विदेशी सलाहकारों के मुद्दे पर
मनमोहन सिंह का पीछे हट जाना,
मार्क्स का विदेशी विचार
स्वदेश प्रेम का नया रंग लाया है।
लगता है गांधी को
काग्रेंस के बजाय
कम्युनिष्टों ने अपनाया हैं।
कामरेड बन्धुओं
अपने अंदर झांको और
कुछ सांसदो […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Sep 19th, 2004 No Comments »
सोनिया गांधी के
रोड शो पर क्रोधित भाजपा
स्वयं रोड पर आ गई।
और पार्टी प्रधान बनने के लिये
दो भद्र महिलायें
आपस में टकरा गई।
उमा का तिरंगा लहराना
सुषमा का अण्डमान जाना
दोनो में भरपूर विश्वास है पर
सिंहासन तो अडवानी जी के पास है।
भाजपा नेताओं से आग्रह है
प्रतियोगिता छोड सोचो, और
फिर से किसी दीनदयाल को खोजो।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Sep 11th, 2004 No Comments »
11 सितम्बर
जब जब आया
अमेरिका बडा घबराया
आकाशीय तारों को पकड कर
अपने झन्डे पर
चिपकाने वाला देश
दुनिया में है सबसे महान
पर नही जानता
धरती पर कहाँ है
ओसामा की दुकान?
तेल के लिये
सद्दाम को पीटना तो जरुरी है
पर समझ नही आया
मुशर्रफ का साथ निभाना
कैसे जरुरी है?
जिस दिन अमरीका
पाकिस्तान को धमकायेगा
ओसामा उस दिन पकडा जायेगा।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Sep 5th, 2004 No Comments »
जनगणना का
जैसे ही बजा ढोल
बढती मुस्लिम आबादी की
खुल गई पोल।
मौलवी जी ने तुरन्त कहा
जब परिवार नियोजन
इस्लाम को नही स्वीकार
तो कैसे रोकें
आबादी की रफ्तार।
आश्चर्य होता है
पाकिस्तान का मुस्लमान
परिवार नियोजन अपनाता है और
भारत का मुस्लमान
इससे शर्माता है।
अपने और देश के
विकास के लिये
आबादी घटाओ
परिवार नियोजन अपनाओ
देश बचाओ।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Aug 29th, 2004 No Comments »
कानून के मंदिर मे
कानून के पहरेदारों ने
कानून के पुजारियों को पीटा यानी
कार्यपालिका ने न्यायपालिका को
सडकों पर घसीटा।
स्वार्थ की लडाई
स्वाभिमान तक आ गई और
देखते ही देखते
लाठी कलम से टकरा गई।
कानून के पुजारियों ने भी पूजा छोड
अपना धर्म निभाया और
सरकारी सम्पति को
जमकर निशाना बनाया।
लोकतन्त्र के स्तम्भ
धीरे-धीरे खोखले हो रहे हैं और
हम लोकतन्त्र नही
उसकी लाश को ढो रहे […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Aug 22nd, 2004 No Comments »
दागी मंत्रियों पर
हो रहा था जमकर दंगा कि
बीच में आ गए
सावरकर और तिरंगा।
देश है जब वोट का मैदान
कैसे मिले सावरकर-तिरंगे को सम्मान
ठाकरे ने चुनावी धर्म निभाया
मर्यादा की राजनीति में
मणिशंकर के सिर पर जूता बजाया।
आजाद भारत पर
अंग्रेज हस रहे हैं
जहाँ आज भी तिरंगा फरहाने पर
लोग जेल की यात्रा कर रहे हैं।
गोधरा हो या भगवाकरण
सावरकर तिरंगा या […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Aug 14th, 2004 No Comments »
मीडिया की शक्त्ति को
सादर नमस्कार।
15 अगस्त की पूर्व सन्ध्या पर
दिखाया है चमत्कार।
धनंजय की फांसी का
कैसा किया है गुणगान
जैसे कोई अपराधी नही
राष्ट्र भक्त जा रहा हो
होने बलिदान।
प्रतिस्पर्धा के युग में
दिल्ली के बस ड्राईवर भी शर्माते हैं
जब टेलीवीजन मीडिया को
अपने से आगे पाते हैं।
आज आवश्यकता है
हत्यारी बसों से
लोगों की जान बचाने की और
गुमराह मीडिया को
सही रास्ते पर […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jun 15th, 2004 No Comments »
कभी अग्रेंजो के पराधीन थे
अब अपनों के अधीन हैं
यानि हम स्वतन्त्र नही स्वाधीन हैं।
स्वतन्त्र मतलब अपना तन्त्र
या कह सकते हैं
गांधी का रामराज।
अग्रेंजी खाना, अग्रेंजी पीना
अग्रेंजी षषा, अग्रेंजी विचार
अग्रेंजी मानसिकता
कैसे कहें कि
आ गई स्वतन्त्रता।
अग्रेंजी को छोड
जब गूंजेगा हिन्दी का मन्त्र
सच्चे अर्थ में
तब होगें हम स्वतन्त्र।
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Posted in साप्ताहिक कालम on Jun 6th, 2004 No Comments »
उन देशों में छाया है
जहाँ अंग्रेजो ने डन्डा बजाया है
अमरीका, चीन या जापान
कहीं नही गूंजती क्रिकेट की तान
ये सब खेल जगत के हीरो हैं
पर हम क्रिकेट को छोड
सब खेलो में जीरो हैं
लंका के ही सम्मुख जब सौरव सेना
इतनी मजबूर है
तो जानिये
वर्ल्ड कप हमसे कितनी दूर है
क्रिकेट के अलावा
अन्य खेलो पर दीजिये ध्यान
तभी ओलम्पिक में हम […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on May 29th, 2004 No Comments »
कुरुक्षेत्र की भूमि में
श्री कृष्ण का अर्जुन को समझाना
पृथ्वी राज चौहान द्वारा निशाना लगाना
काव्य परम्परा का
भारत में बडा सम्मान है
कृष्णमित्र किसी कवि का नही
अपितु उसी परम्परा का नाम है
वर्षो तक गुंजती रहे
आपकी हुंकार
शत शत अभिनन्दन
करें स्वीकार ।
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Posted in साप्ताहिक कालम on May 25th, 2004 No Comments »
झारखंड की शान
शिबू सोरेन महान
कभी सांसदों को रिश्वत देकर
बचाये थे नरसिंह राव के प्राण
आजकल, मंत्री पद पाकर गायब है
यू. पी. ए. जिस से घायल है
ये संसदीय इतिहास का नया चमत्कार है
जब संविधान की शपथ लेने वाला मंत्री
कानून और संविधान की नजरों से फरार है
लगता है मनमोहन सरकार
बनायेगी कुछ ओर कीर्तिमान
फिर कैसे कहेगें कि
मेरा भारत महान […]
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Posted in साप्ताहिक कालम on May 15th, 2004 No Comments »
लोकतन्त्र के मंदिर में
भक्तों ने सुर मे सुर मिलाया
आरती का थाल सजाया
आसुंओं का प्रसाद चढाया
और सबने मिलकर एक साथ गाया
जनता बेकरार है
मां ने भक्तों के प्यार को ठुकराया
और बालकों को समझाया
दर्शनों के लिये मेरे दरबार ही आओ
और जनता के लिये
मेरे मनमोहक सिंह को ले जाओ
भक्तगण थे लाचार
कैसे कहते शाकाहारी शेर अस्वीकार
कुर्सी के चक्कर में
स्वाभिमान छोड
शेर […]
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